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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
ततः शल्यो रणे क्रुद्धः पीने वक्षसि तोमरम् |  ५२   क
निचखान नदन्वीरो वर्म भित्त्वा च सोऽभ्यगात् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति