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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
कृतप्रतिकृतं दृष्ट्वा शल्यो विस्मितमानसः |  ५५   क
गदामाश्रित्य धीरात्मा प्रत्यमित्रमवैक्षत ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति