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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने युद्धे भीरुभय़ावहे |  ७   क
पूर्वाह्णे चैव सम्प्राप्ते भास्करोदय़नं प्रति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति