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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्वुध्येत भारत |  ४२   क
सुरासुराणां लोकानामशेषेण मनोगतम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति