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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
तद्वत्संसारकान्तारमातिष्ठञ्श्रमतत्परः |  १४   क
यात्रार्थमद्यादाहारं व्याधितो भेषजं यथा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति