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आदि पर्व
अध्याय १००
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वैशम्पाय़न उवाच
कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति |  २   क
अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे आगमिष्यति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति