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आदि पर्व
अध्याय १००
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजय़त् |  २२   क
सा तु रूपं च गन्धं च महर्षेः प्रविचिन्त्य तम् |  २२   ख
नाकरोद्वचनं देव्या भय़ात्सुरसुतोपमा ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति