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शान्ति पर्व
अध्याय १००
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भीष्म उवाच
न हि शौर्यात्परं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते |  १८   क
शूरः सर्वं पालय़ति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति