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अनुशासन पर्व
अध्याय १००
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युधिष्ठिर उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममखिलं प्रव्रूहि भरतर्षभ |  १   क
ऋद्धिमाप्नोति किं कृत्वा मनुष्य इह पार्थिव ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति