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अनुशासन पर्व
अध्याय १००
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पृथिव्यु उवाच
राजर्त्विजं स्नातकं च गुरुं श्वशुरमेव च |  २१   क
अर्चय़ेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरोषितान् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति