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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वय़ा सार्धं महामुने |  ११४   क
सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चय़िष्यन्ति ये तु माम् ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति