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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महावने |  १   क
लव्धचक्षुः प्रसन्नात्मा दृष्ट्या सर्वं ददर्श ह ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति