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वन पर्व
अध्याय १००
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लोमश उवाच
ते रात्रौ समभिक्रुद्धा भक्षय़न्ति सदा मुनीन् |  २   क
आश्रमेषु च ये सन्ति पुन्येष्वाय़तनेषु च ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति