वन पर्व  अध्याय १००

लोमश उवाच

प्रभाते समदृश्यन्त निय़ताहारकर्शिताः |  ८   क
महीतलस्था मुनय़ः शरीरैर्गतजीवितैः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति