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भीष्म पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
निर्दश्य दशनैश्चापि क्रोधात्स्वदशनच्छदान् |  ४१   क
भ्रुकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षन्ते च परस्परम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति