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भीष्म पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
स एकः समरे तस्थौ किरन्वहुविधाञ्शरान् |  ११   क
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः शेषा विप्रद्रुता नराः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति