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भीष्म पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
जानन्तोऽपि रणे शौर्यं घोरं गाण्डीवधन्वनः |  १३   क
हाहाकारकृतोत्साहा भीष्मं जग्मुः समन्ततः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति