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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरं तं तु विहृत्य गूढं; नराधमं तं सुखमुद्धरेम |  १०   क
निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं; तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय़ ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति