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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरञ्जय़ |  १६   क
अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान्वहून् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति