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उद्योग पर्व
अध्याय १४७
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वासुदेव उवाच
देवापिस्तु महातेजास्त्वग्दोषी राजसत्तमः |  १७   क
धार्मिकः सत्यवादी च पितुः शुश्रूषणे रतः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति