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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
तथैव तावका राजन्प्रार्थय़न्तो महद्यशः |  १८   क
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा युद्धाय़ैवोपतस्थिरे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति