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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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धृतराष्ट्र उवाच
सोऽत्यन्तसुखसंवृद्धो लक्ष्म्या लोकस्य चेश्वरः |  २५   क
एको वहून्समासाद्य कच्चिन्नासीत्पराङ्मुखः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति