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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च विंशत्या धर्मपुत्रं च सप्तभिः |  ३०   क
केकय़ान्दशभिर्विद्ध्वा द्रौपदेय़ांस्त्रिभिस्त्रिभिः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति