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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
शतशश्चापरान्योधान्सद्विपांश्च रथान्रणे |  ३१   क
शरैरवचकर्तोग्रैः क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति