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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुदिताः पार्थाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् |  ३५   क
यथा वृत्रवधे देवा मुदा शक्रं महर्षिभिः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति