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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
तं तथा वादिनं राजंस्तव पुत्रं महारथम् |  ३७   क
प्रत्युद्ययुः प्रमुदिताः पाञ्चाला जय़गृद्धिनः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति