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द्रोण पर्व
अध्याय १००
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सञ्जय़ उवाच
आह्णिकेषु समूहेषु तव सैन्यस्य मानद |  ६   क
नास्ति लोके समः कश्चित्समूह इति मे मतिः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति