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आदि पर्व
अध्याय १०१
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वैशम्पाय़न उवाच
शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः |  १३   क
निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्युपागमत् |  १३   ख
धारय़ामास च प्राणानृषींश्च समुपानय़त् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति