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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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भीष्म उवाच
प्रकृतौ च विकारे च न मे प्रीतिर्न च द्विषे |  ३१   क
द्वेष्टारं न च पश्यामि यो ममाद्य ममाय़ते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति