आदि पर्व  अध्याय २१८

वैशम्पाय़न उवाच

तांश्चकर्त शरैः पार्थः सरोषान्दृश्य खेचरान् |  २२   क
विवशाश्चापतन्दीप्तं देहाभावाय़ पावकम् ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति