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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
यस्तु देवि यथान्याय़ं दीक्षितो निय़तो द्विजः |  ५२   क
आत्मन्यात्मानमाधाय़ निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति