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शान्ति पर्व
अध्याय १०१
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भीष्म उवाच
श्रिय़ं जानीत धर्मस्य मूलं सर्वसुखस्य च |  ३७   क
सा भीरूणां परान्याति शूरस्तामधिगच्छति ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति