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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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युधिष्ठिर उवाच
आलोकदानं नामैतत्कीदृशं भरतर्षभ |  १   क
कथमेतत्समुत्पन्नं फलं चात्र व्रवीहि मे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति