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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यः पुष्टिं ददाति च |  १७   क
मनो ग्लपय़ते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति