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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
सद्यः प्रीणाति देवान्वै ते प्रीता भावय़न्त्युत |  ३५   क
सङ्कल्पसिद्धा मर्त्यानामीप्सितैश्च मनोरथैः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति