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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि सृष्टा भगवंस्त्वय़ा वै प्रभविष्णुना |  ३३   क
येन यस्मिन्नधीकारे वर्तितव्यं पितामह ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति