अनुशासन पर्व  अध्याय १०१

शुक्र उवाच

य एवोक्ताः सुमनसां प्रदाने गुणहेतवः |  ४३   क
धूपेष्वपि परिज्ञेय़ास्त एव प्रीतिवर्धनाः ||  ४३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति