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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
ज्योतिस्तेजः प्रकाशश्चाप्यूर्ध्वगं चापि वर्ण्यते |  ४५   क
प्रदानं तेजसां तस्मात्तेजो वर्धय़ते नृणाम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति