अनुशासन पर्व  अध्याय १०१

शुक्र उवाच

दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभः |  ५०   क
दीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमाली विराजते ||  ५०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति