अनुशासन पर्व  अध्याय १०१

शुक्र उवाच

गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे |  ५२   क
दीपदाता भवेन्नित्यं य इच्छेद्भूतिमात्मनः ||  ५२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति