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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
कुलोद्द्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति |  ५३   क
ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नरः सदा ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति