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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
गृह्या हि देवता नित्यमाशंसन्ति गृहात्सदा |  ५७   क
वाह्याश्चागन्तवो येऽन्ये यक्षराक्षसपन्नगाः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति