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वन पर्व
अध्याय १०१
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विष्णुरु उवाच
कालेय़ इति विख्यातो गणः परमदारुणः |  ७   क
तैश्च वृत्रं समाश्रित्य जगत्सर्वं प्रवाधितम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति