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वन पर्व
अध्याय १०१
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विष्णुरु उवाच
ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता |  ८   क
जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालय़म् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति