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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्राजो भास्करश्चैव यौ तौ सूर्यानुय़ाय़िनौ |  २८   क
तौ सूर्यः कार्त्तिकेय़ाय़ ददौ प्रीतः प्रतापवान् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति