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उद्योग पर्व
अध्याय १०१
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कण्व उवाच
मातलिस्त्वेकमव्यग्रः सततं संनिरीक्ष्य वै |  १८   क
पप्रच्छ नारदं तत्र प्रीतिमानिव चाभवत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति