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भीष्म पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
उत्पतद्भिश्च तैस्तत्र समुद्धूतं महद्रजः |  १४   क
दिवाकरपथं प्राप्य छादय़ामास भास्करम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति