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भीष्म पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
उद्वृत्तस्य महाराज प्रावृट्कालेन पूर्यतः |  १७   क
पौर्णमास्यामम्वुवेगं यथा वेला महोदधेः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति