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भीष्म पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ते रथिनो राजञ्शरैः संनतपर्वभिः |  १८   क
न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि काय़ेभ्यो हय़सादिनाम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति