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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
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धृतराष्ट्र उवाच
व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारय़ेत्ततः |  ४   क
कर्शनं भीषणं चैव युद्धे चापि वहुक्षय़म् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति